DRIK PANCHANG
प्राक्कथन
सिद्धान्त – सहिताहोरारूपस्कन्यत्रयात्मकम्।
वेदस्य निर्मल चक्षुज्योतिः शास्रमकल्मषम्। ।
विनैतदखिल श्रौत स्मार्तं कर्मं न सिन्क्यति।
तस्माज्जगद्धिदायेद् ब्रह्मणा निर्मित पुरा।।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सवे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।
संसार में सब प्राणि सुखी रहे, सब निरोग रहे, सब अपना कल्याण देखे, कोई भी दुःखी न हो इसी कामना के महर्षियों ने शास्र पुराणादिकों की रचना की। उन समस्त शास्त्र मे ज्यौतिषशास्त्र वेदो का निर्मल नेत्र माना गया है। क्योकि इसी शास्त्र से देश, दिशा ओर काल का ज्ञान होता है। बिना इन तीनों के ज्ञान से संसार मे सामाजिक, राजनैतिक वाधा्िक कार्यो की सिद्धि नहीं हो सकती है। इस शास्र के दो विभाग हैँ, एक सिद्धन्त(गणित) ओर दुसरा फलित।
स्वभावतः लोगों को समय का शुभाशुभत्व तथा अपने जीवन कौ भविष्य जानने की इच्छा हुआ करती है, किन्तु बिना तिस्कन्ध ज्योतिष (सिद्धान्त, संहिता, 1) सम्यक ज्ञान का होना आवश्यक है। क्योकि संहिता ओर जातक के अनेक ग्रन्थ है। एक एक ग्रन्थ भी विस्तृत है। जिससे थोड़े समय में उनका अध्ययन (ज्ञान) असंभव है।